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शल्य पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
कथं दुःखमिदं तीव्रं गान्धारी प्रसहिष्यति |  १३   क
श्रुत्वा विनिहतं पुत्रं छलेनाजिह्मय़ोधिनम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति