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शल्य पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
साह्यं तथा महावाहो दत्तमस्माकमच्युत |  १८   क
सारथ्येन च वार्ष्णेय़ भवता यद्धृता वय़म् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति