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शान्ति पर्व
अध्याय १०४
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भीष्म उवाच
आदिमध्यावसानज्ञः प्रच्छन्नं च विचारय़ेत् |  १५   क
वलानि दूषय़ेदस्य जानंश्चैव प्रमाणतः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति