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शान्ति पर्व
अध्याय ३०६
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भीष्म उवाच
उपनिषदमुपाकरोत्तदा वै; जनकनृपस्य पुरा हि याज्ञवल्क्यः |  १०८   क
यदुपगणितशाश्वताव्ययं त; च्छुभममृतत्वमशोकमृच्छतीति ||  १०८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति