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शल्य पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
स मुहूर्तमिवोत्सृज्य वाष्पं शोकसमुद्भवम् |  ३७   क
प्रक्षाल्य वारिणा नेत्रे आचम्य च यथाविधि |  ३७   ख
उवाच प्रश्रितं वाक्यं धृतराष्ट्रमरिन्दमः ||  ३७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति