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शल्य पर्व
अध्याय ६२
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जनमेजय़ उवाच
विद्रुते शिविरे शून्ये प्राप्ते यशसि चोत्तमे |  ४   क
किं नु तत्कारणं व्रह्मन्येन कृष्णो गतः पुनः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति