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शल्य पर्व
अध्याय ६२
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जनमेजय़ उवाच
न चैतत्कारणं व्रह्मन्नल्पं वै प्रतिभाति मे |  ५   क
यत्रागमदमेय़ात्मा स्वय़मेव जनार्दनः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति