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शल्य पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
एतावदुक्त्वा वचनं मुखं प्रच्छाद्य वाससा |  ६४   क
पुत्रशोकाभिसन्तप्ता गान्धारी प्ररुरोद ह ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति