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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
यतोऽहं प्रसृतः पूर्वमव्यक्तात्त्रिगुणो महान् |  ६७   क
तस्मात्परतरो योऽसौ क्षेत्रज्ञ इति कल्पितः |  ६७   ख
सोऽहं क्रिय़ावतां पन्थाः पुनरावृत्तिदुर्लभः ||  ६७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति