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शल्य पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततस्त्वरित उत्थाय़ पादौ मूर्ध्ना प्रणम्य च |  ६७   क
द्वैपाय़नस्य राजेन्द्र ततः कौरवमव्रवीत् ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति