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शल्य पर्व
अध्याय ६२
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वैशम्पाय़न उवाच
आपृच्छे त्वां कुरुश्रेष्ठ मा च शोके मनः कृथाः |  ६८   क
द्रौणेः पापोऽस्त्यभिप्राय़स्तेनास्मि सहसोत्थितः |  ६८   ख
पाण्डवानां वधे रात्रौ वुद्धिस्तेन प्रदर्शिता ||  ६८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति