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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
यज्ञैर्ये चापि यक्ष्यन्ति सर्वलोकेषु वै सुराः |  ५४   क
कल्पय़िष्यन्ति वो भागांस्ते नरा वेदकल्पितान् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति