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शान्ति पर्व
अध्याय २२१
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श्रीरु उवाच
सन्तुष्टभृत्यसचिवाः कृतज्ञाः प्रिय़वादिनः |  ३४   क
यथार्थमानार्थकरा ह्रीनिषेधा यतव्रताः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति