शल्य पर्व  अध्याय ६२

वैशम्पाय़न उवाच

वासुदेवोऽपि धर्मात्मा कृतकृत्यो जगाम ह |  ७२   क
शिविरं हास्तिनपुराद्दिदृक्षुः पाण्डवान्नृप ||  ७२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति