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आदि पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
विषमं पर्वतप्रस्थैरश्मभिश्च समावृतम् |  १३   क
निर्जलं निर्मनुष्यं च वहुय़ोजनमाय़तम् |  १३   ख
मृगसङ्घैर्वृतं घोरैरन्यैश्चापि वनेचरैः ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति