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शान्ति पर्व
अध्याय ६३
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भीष्म उवाच
सेव्यं तु व्रह्मषट्कर्म गृहस्थेन मनीषिणा |  २   क
कृतकृत्यस्य चारण्ये वासो विप्रस्य शस्यते ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति