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शान्ति पर्व
अध्याय ६३
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भीष्म उवाच
शूद्रो राजन्भवति व्रह्मवन्धु; र्दुश्चारित्र्यो यश्च धर्मादपेतः |  ४   क
वृषलीपतिः पिशुनो नर्तकश्च; ग्रामप्रैष्यो यश्च भवेद्विकर्मा ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति