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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
स सरांसि नदीश्चैव वनान्युपवनानि च |  ६   क
अत्यक्रामन्महाराजो गिरिं चैवान्वपद्यत ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति