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शल्य पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
समास्तस्या व्यतिक्रान्ता वह्व्यः कुरुकुलोद्वह |  ४   क
चरन्त्या निय़मांस्तांस्तान्स्त्रीभिस्तीव्रान्सुदुश्चरान् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति