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वन पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
नूनं च तव नैवास्ति मन्युर्भरतसत्तम |  ३३   क
यत्ते भ्रातॄंश्च मां चैव दृष्ट्वा न व्यथते मनः ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति