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सभा पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्त्वा धृतराष्ट्रो मनीषी; हितान्वेषी वान्धवानामपाय़ात् |  २६   क
कृष्णां पाञ्चालीमव्रवीत्सान्त्वपूर्वं; विमृश्यैतत्प्रज्ञय़ा तत्त्ववुद्धिः ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति