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सभा पर्व
अध्याय ६३
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धृतराष्ट्र उवाच
वरं वृणीष्व पाञ्चालि मत्तो यदभिकाङ्क्षसि |  २७   क
वधूनां हि विशिष्टा मे त्वं धर्मपरमा सती ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति