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वन पर्व
अध्याय ६३
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वृहदश्व उवाच
स दृष्ट्वा विस्मितस्तस्थावात्मानं विकृतं नलः |  १२   क
स्वरूपधारिणं नागं ददर्श च महीपतिः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति