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वन पर्व
अध्याय ६३
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वृहदश्व उवाच
विषेण संवृतैर्गात्रैर्यावत्त्वां न विमोक्ष्यति |  १५   क
तावत्त्वय़ि महाराज दुःखं वै स निवत्स्यति ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति