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वन पर्व
अध्याय ६३
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वृहदश्व उवाच
गच्छ राजन्नितः सूतो वाहुकोऽहमिति व्रुवन् |  १९   क
समीपमृतुपर्णस्य स हि वेदाक्षनैपुणम् |  १९   ख
अय़ोध्यां नगरीं रम्यामद्यैव निषधेश्वर ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति