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विराट पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
अवजित्य धनं चापि विराटो वाहिनीपतिः |  १   क
प्राविशन्नगरं हृष्टश्चतुर्भिः सह पाण्डवैः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति