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विराट पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
सर्वथा कुरवस्ते हि ये चान्ये वसुधाधिपाः |  १०   क
त्रिगर्तान्निर्जिताञ्श्रुत्वा न स्थास्यन्ति कदाचन ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति