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विराट पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं स राजा मत्स्यानां विराटोऽक्षौहिणीपतिः |  १३   क
व्यादिदेशाथ तां क्षिप्रं वाहिनीं चतुरङ्गिणीम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति