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विराट पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
तमव्रवीद्धर्मराजः प्रहस्य; विराटमार्तं कुरुभिः प्रतप्तम् |  १५   क
वृहन्नडा सारथिश्चेन्नरेन्द्र; परे न नेष्यन्ति तवाद्य गास्ताः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति