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विराट पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
जित्वा त्रिगर्तान्सङ्ग्रामे गाश्चैवादाय़ केवलाः |  २   क
अशोभत महाराजः सह पार्थैः श्रिय़ा वृतः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति