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विराट पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्तः कुपितो राजा मत्स्यः पाण्डवमव्रवीत् |  ३८   क
समं पुत्रेण मे षण्ढं व्रह्मवन्धो प्रशंससि ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति