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विराट पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
वय़स्यत्वात्तु ते व्रह्मन्नपराधमिमं क्षमे |  ४०   क
नेदृशं ते पुनर्वाच्यं यदि जीवितुमिच्छसि ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति