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वन पर्व
अध्याय ८०
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पुलस्त्य उवाच
वरदाने नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् |  ८२   क
ततो द्वारवतीं गच्छेन्निय़तो निय़ताशनः |  ८२   ख
पिण्डारके नरः स्नात्वा लभेद्वहु सुवर्णकम् ||  ८२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति