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विराट पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो हृष्टो मत्स्यराजः क्षत्तारमिदमव्रवीत् |  ५१   क
प्रवेश्यतामुभौ तूर्णं दर्शनेप्सुरहं तय़ोः ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति