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विराट पर्व
अध्याय ६३
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वैशम्पाय़न उवाच
न मृष्याद्भृशसङ्क्रुद्धो मां दृष्ट्वैव सशोणितम् |  ५४   क
विराटमिह सामात्यं हन्यात्सवलवाहनम् ||  ५४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति