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वन पर्व
अध्याय ७६
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वृहदश्व उवाच
ततो गृह्याश्वहृदय़ं तदा भाङ्गस्वरिर्नृपः |  १८   क
सूतमन्यमुपादाय़ यय़ौ स्वपुरमेव हि ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति