वन पर्व  अध्याय २०५

मार्कण्डेय़ उवाच

प्रवृत्तचक्षुर्जातोऽस्मि सम्पश्य तपसो वलम् |  २   क
यदर्थमुक्तोऽसि तय़ा गच्छस्व मिथिलामिति ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति