द्रोण पर्व  अध्याय ६३

सञ्जय़ उवाच

ततो दुःशासनश्चैव विकर्णश्च तवात्मजौ |  २०   क
सिन्धुराजार्थसिद्ध्यर्थमग्रानीके व्यवस्थितौ ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति