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द्रोण पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
विस्फार्य च धनूंष्याजौ ज्याः करैः परिमृज्य च |  ३   क
विनिःश्वसन्तः प्राक्रोशन्क्वेदानीं स धनञ्जय़ः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति