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द्रोण पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
सिद्धचारणसङ्घानां विस्मय़ः सुमहानभूत् |  ३१   क
द्रोणेन विहितं दृष्ट्वा व्यूहं क्षुव्धार्णवोपमम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति