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कर्ण पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
व्रह्मा व्रह्मर्षिभिः सार्धं प्रजापतिभिरेव च |  ४६   क
भवेनावस्थितो यानं दिव्यं तं देशमभ्ययात् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति