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कर्ण पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
दृष्ट्वा प्रजापतिं देवाः स्वय़म्भुवमुपागमन् |  ४७   क
समोऽस्तु देव विजय़ एतय़ोर्नरसिंहय़ोः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति