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कर्ण पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
कर्णो लोकानय़ं मुख्यान्प्राप्नोतु पुरुषर्षभः |  ५५   क
वीरो वैकर्तनः शूरो विजय़स्त्वस्तु कृष्णय़ोः ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति