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कर्ण पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
अद्य द्रष्टासि गोविन्द कर्णमुन्मथितं मय़ा |  ८१   क
वारणेनेव मत्तेन पुष्पितं जगतीरुहम् ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति