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शल्य पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
किं नु चित्रमतस्त्वद्य भग्नसक्थस्य यन्मम |  १५   क
क्रुद्धेन भीमसेनेन पादेन मृदितं शिरः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति