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शल्य पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
मानिता वान्धवाः सर्वे मान्यः सम्पूजितो जनः |  २१   क
त्रितय़ं सेवितं सर्वं को नु स्वन्ततरो मय़ा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति