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शल्य पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
यदिष्टं क्षत्रवन्धूनां स्वधर्ममनुतिष्ठताम् |  २५   क
निधनं तन्मय़ा प्राप्तं को नु स्वन्ततरो मय़ा ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति