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शल्य पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
समन्तपञ्चके पुण्ये त्रिषु लोकेषु विश्रुते |  ३९   क
अहं निधनमासाद्य लोकान्प्राप्स्यामि शाश्वतान् ||  ३९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति