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द्रोण पर्व
अध्याय १२९
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सञ्जय़ उवाच
तत्र नागा रथाश्चैव जाम्वूनदविभूषिताः |  २८   क
निशाय़ां प्रत्यदृश्यन्त मेघा इव सविद्युतः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति