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शल्य पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
वाहू धरण्यां निष्पिष्य मुहुर्मत्त इव द्विपः |  ६   क
प्रकीर्णान्मूर्धजान्धुन्वन्दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन् |  ६   ख
गर्हय़न्पाण्डवं ज्येष्ठं निःश्वस्येदमथाव्रवीत् ||  ६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति