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शल्य पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
भीष्मे शान्तनवे नाथे कर्णे चास्त्रभृतां वरे |  ७   क
गौतमे शकुनौ चापि द्रोणे चास्त्रभृतां वरे ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति